ई-लर्निंग में भाषा की समस्या: भारतीय भाषाई विविधता और हिंदी भाषी विद्यार्थियों के समक्ष चुनौतियों का विश्लेषण
DOI:
https://doi.org/10.59828/ijeve.v2i2.36Abstract
भारत में ई-लर्निंग की संकल्पना ने पिछले एक दशक में असाधारण विस्तार प्राप्त किया है। COVID-19 महामारी के पश्चात् यह विस्तार और भी त्वरित गति से हुआ है। किन्तु इस शिक्षा क्षेत्र में आई इस नई क्रांति के भीतर एक मूलभूत प्रश्न अनुत्तरित रहा है – "क्या यह ई-लर्निंग प्रणाली वास्तव में उन विद्यार्थियों तक प्रभावी रूप से पहुँच पा रही है जो हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में सोचते, समझते और सीखते हैं?" प्रस्तुत शोध-लेख इसी प्रश्न के उत्तर की दिशा में एक विश्लेषणात्मक प्रयास है।
यह अध्ययन विशेष रूप से सरकारी सहायता प्राप्त उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में अध्ययनरत हिंदी भाषी विद्यार्थियों की स्थिति पर केंद्रित है। इन विद्यार्थियों के समक्ष केवल डिजिटल विभाजन (Digital Divide) की चुनौती नहीं है, बल्कि एक और गहरी खाई है – भाषाई विभाजन। डिजिटल संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद यदि सामग्री की भाषा विद्यार्थी की मातृभाषा या शिक्षण-माध्यम से भिन्न हो, तो वह सामग्री शैक्षिक दृष्टि से निरर्थक हो जाती है।
इस लेख में अंग्रेज़ी-प्रभुत्व वाली ई-लर्निंग सामग्री, अनुवाद की निम्न गुणवत्ता, तकनीकी शब्दावली की जटिलता, मिश्रित भाषा (Hinglish) की अवधारणात्मक समस्याएँ तथा हिंदी माध्यम विद्यार्थियों के आत्मविश्वास पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। साथ ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, DIKSHA, SWAYAM जैसी सरकारी पहलों की समीक्षा करते हुए बहुभाषिक ई-लर्निंग के संभावित समाधानों की पड़ताल की गई है।
अध्ययन के प्रमुख निष्कर्षों में यह स्थापित होता है कि भाषा केवल एक माध्यम नहीं, बल्कि अधिगम की आत्मा है। मातृभाषा आधारित डिजिटल शिक्षा सामग्री का विकास और AI-आधारित बहुभाषिक उपकरणों का समन्वय भारतीय शिक्षा प्रणाली में डिजिटल समता लाने की दिशा में सर्वाधिक प्रभावकारी मार्ग है।
मुख्य शब्द: ई-लर्निंग, भाषा बाधा, हिंदी भाषी विद्यार्थी, डिजिटल शिक्षा, भारतीय भाषाएँ, ऑनलाइन अधिगम, मातृभाषा शिक्षा, डिजिटल विभाजन, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020।
