भारतीय ज्ञान परंपरा में बुद्धि की अवधारणा: अर्थ, प्रकार, मापन-उपाय और जीवनोपयोगिता

लेखक

  • डॉ. सुरेन्द्र पाल सिंह सहायक आचार्य, शिक्षक शिक्षा विभाग, डी.एस. कॉलेज, अलीगढ़ ##default.groups.name.author##

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https://doi.org/10.59828/ijeve.v1i2.7

सार

भारतीय ज्ञान परंपरा में “बुद्धि” का अर्थ मात्र बौद्धिक क्षमता नहीं, बल्कि वह तत्त्व है जो विवेक, नीतिनिर्णय और आत्मानुभूति का आधार बनता है। वेदों, उपनिषदों, गीता, योगदर्शन तथा बौद्ध और वेदान्त परंपरा में बुद्धि को आत्मा के मार्गदर्शक सारथि के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। कठोपनिषद् (1.3.3) में कहा गया— “आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥” अर्थात् बुद्धि वह सारथि है जो मन और इन्द्रियों को संयमित कर आत्मा को सत्यगति प्रदान करती है। भगवद्गीता में (18.30–32) सात्त्विक, राजस और तामस बुद्धि का विवेचन करते हुए श्रीकृष्ण ने धर्म-अधर्म के यथार्थ निर्णय को सात्त्विक बुद्धि का लक्षण बताया है। योगदर्शन में पतञ्जलि “विवेकख्याति” को मोक्ष का उपाय मानते हैं— “विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः॥” (योगसूत्र, II.26) बौद्ध परंपरा में “प्रज्ञा” त्रिशिक्षा (शील, समाधि, प्रज्ञा) का तृतीय एवं श्रेष्ठ अंग मानी गई है, जो यथाभूत ज्ञान के द्वारा दुःखनिवारण का साधन बनती है।

यह लेख बुद्धि की परिभाषा, उसके प्रकार, भारतीय सन्दर्भ में मापन-उपाय तथा उसके व्यावहारिक एवं आध्यात्मिक उपयोग को विवेचित करता है। लेख का उद्देश्य यह दर्शाना है कि भारतीय दृष्टिकोण में बुद्धि केवल तार्किक नहीं, बल्कि नैतिक, करुणामूलक और आत्मबोधमुखी भी है।

मुख्य शब्द: बुद्धि, प्रज्ञा, विवेक, सात्त्विक बुद्धि, स्थिरप्रज्ञ, योगसूत्र, श्रुतमयी-चिन्तामयी-भावनामयी प्रज्ञा, वेदान्त, भारतीय ज्ञान परंपरा।

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प्रकाशित

2025-10-30

अंक

खंड

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